Class 10 Social Science

Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 2)

Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 2)

BoardUP Board
TextbookNCERT
ClassClass 10
SubjectSocial Science
ChapterChapter 7
Chapter Nameभारतीय विदेश नीति
CategorySocial Science
Site Nameupboardmaster.com

UP Board Master for Class 10 Social Science Chapter 7 भारतीय विदेश नीति (अनुभाग – दो)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश-नीति का क्या अर्थ है ? भास्तीय विदेश-नीति के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
या
भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या

भारत की विदेश नीति की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
या

भारत की विदेश-नीति की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या

किसी विदेशी पत्रिका में भारत को एक साम्राज्यवादी देश बताया गया है। इसका खण्डन करने के लिए उस पत्रिका के सम्पादक को क्या लिखेंगे ?
या
भारतीय विदेश नीति के विशिष्ट लक्षणों की व्याख्या कीजिए
या

भारतीय विदेश नीति के किन्हीं तीन सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या

पंचशील तथा भारत की विदेश नीति पर एक लेख लिखिए।
या

भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या

भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं? उनमें से किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए।
या

भारत की विदेश नीति की किन्हीं चार विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
विदेश-नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो कोई देश अन्य देशों के प्रति अपनाता है।

भारत की विदेश-नीति की विशेषताएँ/लक्षण/व/सिद्धान्त

भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ/लक्षण/तत्त्व/सिद्धान्त निम्नलिखित हैं–

1. गुट-निरपेक्षता– 
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सम्पूर्ण विश्व दो सैन्य मुटों में बँट गया था। प्रथम गुट
संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में तथा (UPBoardMaster.com) दूसरा गुट पूर्ववर्ती सोवियत संघ के नेतृत्व में था। ऐसी स्थिति में भारत ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गुट-निरपेक्ष रहने का निर्णय लिया। गुट-निरपेक्षता भारत की । विदेश-नीति में सर्वोपरि है। गुट-निरपेक्षता की नीति साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद की घोर विरोधी है। देश के विकास के लिए किसी विशेष गुट में सम्मिलित होने की अपेक्षा गुट-निरपेक्ष रहकर सभी देशों को सहयोग करना इस नीति का मूल आधार है।


2. पंचशील के सिद्धान्त में आस्था- 
भारत बौद्ध धर्म के पाँच व्रतों पर आधारित ‘पंचशील’ के सिद्धान्त
में गहन आस्था रखता है। सन् 1954 ई० में भारत तथा चीन ने एक मैत्री सन्धि के अन्तर्गत इस सिद्धान्त की घोषणा की थी। सन् 1955 ई० में बाण्डंग सम्मेलन में तृतीय विश्व के 29 देशों तथा बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया। इस सिद्धान्त के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं

  • सभी देशों की परस्पर प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना,
  • दूसरे देशों पर आक्रमण न करना,
  • दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना,
  • सभी देशों को बराबर समझना तथा
  • शान्ति और सौहार्दपूर्वक सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।

3. समस्त राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध– भारत की विदेश नीति के निर्धारणकर्ता पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य विश्व के समस्त राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना है। भारत इस नीति का (UPBoardMaster.com) निरन्तर पालन करता रहा है। वह अपने पड़ोसी देशों से ही नहीं, अपितु सभी राष्ट्रों से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा व्यापारिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है।

4. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व- 
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति का प्रमुख अंग है। यह भी पंचशील के सिद्धान्तों पर आधारित है। इसकी तीन प्रमुख शर्ते हैं-

  • प्रत्येक राष्ट्र के स्वतन्त्र अस्तित्व को पूर्ण मान्यता,
  • प्रत्येक राष्ट्र को अपने भाग्य का निर्माण करने के अधिकार की मान्यता तथा
  • पिछड़े हुए राष्ट्रों का विकास एक निष्पक्ष अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण द्वारा किया जाना। इस सिद्धान्त के पीछे यह चिन्तन है कि यदि महाशक्तियाँ कमजोर देशों के भाग्य का निर्धारण करेंगी तो कोई भी देश आर्थिक विकास नहीं कर सकेगा। इसलिए सभी राष्ट्रों को अपने ढंग से आर्थिक विकास
    करने का अवसर मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त का अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर अच्छा प्रभाव पड़ा है।

5. रंग-भेद नीति का विरोध- भारत रंग-भेद नीति अथवा नस्लवाद का कट्टर विरोधी है। इसलिए | उसने दक्षिण अफ्रीका में 1994 ई० तक स्थापित अल्प मत वाली गोरी सरकार द्वारा अपनायी गयी रंग-भेद’ की नीति का सदैव विरोध किया। वास्तव में रंग-भेद नीति मानवता का घोर अपमान है।

6. विश्व-शान्ति तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में सहयोग– 
भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से निपटारा करने का समर्थक है। इसलिए वह संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ। सहयोग का पक्षधर है। विश्व शान्ति कायम करने के लिए भारत निरस्त्रीकरण पर भी बल देता है।

7. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध- साम्राज्यवादी शोषण से त्रस्त भारत ने अपनी विदेश-नीति में साम्राज्यवाद के प्रत्येक रूप का कटु विरोध किया है। भारत इस प्रकार की प्रवृत्तियों को विश्व-शान्ति एवं विश्व-व्यवस्था के लिए घातक एवं कलंकमय मानता है। के० एम० पणिक्कर के अनुसार, “भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि यह पराधीन लोगों की स्वतन्त्रता के प्रति आवाज उठाता रहा है; क्योंकि भारत का दृढ़ (UPBoardMaster.com) विश्वास है कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद हमेशा से आधुनिक युद्धों का कारण रहा है।

भारत की विदेश नीति के ऊपर उल्लिखित बिन्दुओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत एक साम्राज्यवादी देश नहीं है। यदि किसी विदेशी पत्रिका में ऐसा लिखा गया है कि भारत एक साम्राज्यवादी देश है तो यह पूर्णतया असत्य एवं भ्रामक है। इसके लिए सम्बन्धित पत्रिका के सम्पादक
के प्रति भारत को कड़ा विरोध जताना चाहिए।

प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ? इसके बदलते स्वरूप का वर्णन कीजिए।
या
भारत की गुट-निरपेक्ष नीति को स्पष्ट कीजिए। गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं ?
या
गुट-निरपेक्षता में भारत के योगदान का वर्णन कीजिए। “भारतीय विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता है।” स्पष्ट कीजिए।
या

विश्व-शान्ति के लिए गुट-निरपेक्षता क्यों आवश्यक है ? इसके महत्व का वर्णन उचित उदाहरणों सहित कीजिए।
या

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रारम्भ क्यों हुआ ? प्रारम्भ में इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देशों के नाम लिखिए।
या

गृट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या वर्तमान समय में भी भारत को इसका पालन करना चाहिए?
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता.का अर्थ-शक्ति के किसी भी गुट में सम्मिलित न होना तथा अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में बिना किसी बाह्य दबाव के अच्छाई व बुराई को ध्यान में रखकर स्वतन्त्र निर्णय लेना गुटनिरपेक्षता है।

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् सम्पूर्ण विश्व दो गुटों में बँट गया। एक गुट का नेतृत्व अमेरिका ने किया और दूसरे गुट का सोवियत संघ (रूस) ने। दोनों गुटों में अनेक कारणों को लेकर भीषण शीतयुद्ध प्रारम्भ हो गया। यूरोप और एशिया के अधिकांश देश इस गुटबन्दी में फँस गये और वे किसी-न-किसी गुट में
सम्मिलित हो गये। स्वतन्त्र भारत की विदेश (UPBoardMaster.com) नीति के निर्माता पं० जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति का आधार गुट-निरपेक्षता (Non-Alignment) को बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम किसी गुट में सम्मिलित नहीं हो सकते, क्योंकि हमारे देश में आन्तरिक समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि हम दोनों गुटों से सम्बन्ध बनाये बिना उन्हें सुलझा नहीं सकते।’ सन् 1961 ई० में बेलग्रेड में हुए गुट-निरपेक्ष देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन में केवल 25 देशों ने भाग लिया था, किन्तु धीरे-धीरे गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने वाले देशों की संख्या में वृद्धि होती गयी। अब इनकी संख्या 120 हो गयी है। इसमें भाग लेने वाले दो प्रमुख देश इण्डोनेशिया व मिस्र थे।

गृट-निरपेक्षता में भारत का योगदान

गुट-निरपेक्षता के विकास में भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख सिद्धान्त ही गुट-निरपेक्षता है। सर्वप्रथम, भारत ने ही एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित स्वतन्त्र राष्ट्रों को परस्पर एकता और सहयोग के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया था। ‘बाण्डंग सम्मेलन में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस प्रकार भारत गुट-निरपेक्षता का अग्रणी रहा है। पं० जवाहरलाल नेहरू का कथन था, “चाहे कुछ भी हो जाए, हम किसी भी देश के साथ सैनिक सन्धि नहीं करेंगे। जब हम गुट-निरपेक्षता का विचार छोड़ते हैं तो हम अपना संसार छोड़कर हटने लगते हैं। किसी देश से बँधना अपने आत्म-सम्मान को खोना तथा अपनी बहुमूल्य नीति का अनादर करना है।” पं० नेहरू के बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी ने गुट-निरपेक्षता के विकास को अग्रसरित (UPBoardMaster.com) किया। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने सातवें सम्मेलन (1983 ई०) में नयी दिल्ली में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षता ग्रहण की थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि “गुट-निरपेक्षता स्वयं में एक नीति है। यह केवल एक लक्ष्य ही नहीं, इसके पीछे उद्देश्य यह है कि निर्णयकारी स्वतन्त्रता और राष्ट्र की सच्ची भक्ति तथा बुनियादी हितों की रक्षा की जाए।

प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रभावशाली बनाने के लिए कृत-संकल्प थे। 15 अगस्त, 1986 ई० को श्री राजीव गांधी ने कहा था, “भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण ही भारत का विश्व में आदर है। उसके साथ संसार के दो-तिहाई गुट-निरपेक्ष देशों की आवाज होती है।” नवे शिखर सम्मेलन (सितम्बर, 1989 ई०) में प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कहा था कि “गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तभी गतिशील रह सकता है, जब यह उन्हीं सिद्धान्तों पर चले, जिन पर चलने का वायदा यहाँ 1961 ई० में प्रथम सम्मेलन में सदस्यों ने किया था।” ग्यारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने दो बातों के प्रसंग में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। भारत ने आणविक शस्त्रों पर आणविक शक्तियों के एकाधिकार का विरोध किया। बारहवें सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान (UPBoardMaster.com) की आणविक विस्फोट के लिए आलोचना की गयी। सम्मेलन के अध्यक्ष नेल्सन मण्डेला द्वारा कश्मीर समस्या का उल्लेख किये जाने पर भारत द्वारा कड़ी आपत्ति की गयी। भारत की आपत्ति को दृष्टि में रखते हुए नेल्सन मण्डेला ने अपना वक्तव्य वापस ले लिया।

तेरहवें शिखर सम्मेलन में प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता हेतु भी पहल की। प्रधानमन्त्री श्री वी० पी० सिंह भी गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के प्रबल समर्थक रहे हैं और तत्पश्चात् प्रधानमन्त्री श्री चन्द्रशेखर भी इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने भी इसी नीति को जारी रखा। इसके बाद प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार देश की सुरक्षा और अखण्डता के मुद्दे पर समयानुसार विदेश नीति निर्धारित करने के लिए दृढ़ संकल्प थी।

सोवियत रूस के विघटन के बाद गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का राजनीतिक महत्त्व अवश्य कुछ कम हो गया है, परन्तु इसकी आर्थिक भूमिका पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी है। औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा उदार अर्थव्यवस्था को विश्वस्तरीय आकार देने के कारण बहुसंख्यक गरीब एवं विकासशील देश आज न चाहते हुए भी आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी की भूमिका में खड़े हो गये हैं। धनी एवं सम्पन्न राष्ट्रों में संरक्षणवादी प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं और साम्राज्यवाद का एक नया आर्थिक रूप सामने आ रहा है। मुक्त व्यापार के नाम पर अमीर देश विकासशील देशों पर हर प्रकार के प्रतिबन्ध चाहते हैं। अत: विकासशील राष्ट्रों के लिए सामूहिक रूप से अपने आर्थिक एवं व्यापारिक हितों की सुरक्षा करने की आवश्यकता बढ़ गयी है। इस प्रकार गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को अपना स्वरूप बदलकर; अर्थात् स्वयं को राजनीतिक मोर्चे से आर्थिक मोर्चे की (UPBoardMaster.com) ओर मोड़कर; अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। निश्चित ही यह गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की नयी भूमिका की शुरुआत होगी।

प्रश्न 3.
पंचशील से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या

पंचशील से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। पंचशील के तीन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
वर्तमान राजनीतिक स्थिति में पंचशील के कौन-से दो सिद्धान्त अधिक उपयोगी हैं?
या
पंचशील’ के प्रस्ताव पर सर्वप्रथम किन दो देशों में सहमति बनी थी?
या
पंचशील के किन्हीं दो बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत की विदेश नीति का प्रमुख आदर्श पंचशील रहा है। जून, 1954 ई० में पं० जवाहरलाल नेहरू के द्वारा इस सिद्धान्त की सर्वप्रथम घोषणा तथा प्रतिपादन भारत और चीन के मध्य हुए एक समझौते में की गयी थी। पंचशील का सिद्धान्त महात्मा बुद्ध के उन पाँच सिद्धान्तों पर आधारित है, जो उन्होंने व्यक्तिगत आचरण के लिए निर्धारित किये थे। पंचशील के सिद्धान्तों का सूत्रपात पं० जवाहरलाल नेहरू व चीन के तत्कालीन (UPBoardMaster.com) प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई के मध्य तिब्बत सम्बन्धी समझौते के समय में हुआ था। भारत व चीन तथा अनेक एशियाई व अफ्रीकी देशों ने अप्रैल, 1995 ई० में बाण्डंग सम्मेलन में इन्हें स्वीकार किया था, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सद्भाव में वृद्धि हो। पंचशील के पाँच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|

  • सभी राष्ट्र एक-दूसरे की सम्प्रभुता तथा अखण्डता का सम्मान करें।
  • कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण न करे तथा शान्तिपूर्ण तरीकों से पारस्परिक विवादों का समाधान करें।
  • कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे।
  • सभी राष्ट्र पारस्परिक समानता तथा पारस्परिक हितों में अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहें।
  • सभी राष्ट्र शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना के साथ अर्थात् मिल-जुलकर शान्तिपूर्वक रहें और | परस्पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम रखें।

भारत और चीन के साथ अन्य राष्ट्रों ने भी इसका समर्थन किया था तथा संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। यद्यपि पंचशील के सिद्धान्त की घोषणा सर्वप्रथम भारत और चीन के बीच हुई थी; किन्तु फिर भी, चीन ने पंचशील के समझौते और सिद्धान्त का पालन नहीं किया तथा 1962 ई० में भारत पर आक्रमण कर दिया।

भले ही, उस समय चीन ने इस सिद्धान्त के महत्त्व को नहीं समझा; किन्तु आज जब विश्व पर परमाणु युद्ध के बादल मँडरा रहे हैं, यह सिद्धान्त बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि सम्पूर्ण विश्व में शान्ति कायम रहे, जिससे विश्व को तीसरे महायुद्ध की विभीषिका का सामना न करना पड़े। इसके लिए प्रत्येक राष्ट्र को पंचशील के मर्म अर्थात् ‘शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व’ का पालन करना चाहिए। सभी देशों को अपनी स्वतन्त्रता और अखण्डता के साथ पड़ोसी या अन्य देशों की अखण्डता का भी आदर करना चाहिए। वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में पंचशील ही विश्व-शान्ति का एकमात्र मार्ग है।

प्रश्न 4.
निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके सम्बन्ध में भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

निःशस्त्रीकरण

भारत की विदेश नीति शान्ति और अहिंसा की विदेश नीति रही है। फलत: भारत नि:शस्त्रीकरण का प्रबल समर्थक रहा है। नि:शस्त्रीकरण के सम्बन्ध में यह मान्यता रही है कि युद्धों का एक प्रमुख कारण शस्त्रों का अस्तित्व है। अत: नि:शस्त्रीकरण ही अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को सुदृढ़ बना सकता है। यह शस्त्रों के उत्पादन पर होने वाले बेहिसाब खर्च से छुटकारा दिला सकता है। इसके द्वारा बचाये गये साधनों तथा धन का प्रयोग सभी राष्ट्रों के विकास के लिए किया जा सकता है। इसीलिए भारत की विदेश नीति हथियारों विशेषकर परमाणु हथियारों के नि:शस्त्रीकरण की प्रबल समर्थक रही है। अपनी इस मान्यता के (UPBoardMaster.com) कारण भारत और उसके अन्य सहयोगी देशों ने सन् 1961 ई० में आणविक परीक्षणों को बन्द करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में रखा। सन् 1962 ई० में जेनेवा के नि:शस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत ने अपने सात अन्य सहयोगी देशों के सहयोग से सम्मेलन में एक स्मरण-पत्र प्रस्तुत किया। सन् 1988 ई० में नि:शस्त्रीकरण के लिए आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के तीसरे सत्र में भारत ने एक कार्ययोजना ‘परमाणु शस्त्रमुक्त और अहिंसक विश्व-व्यवस्था प्रस्तुत की थी।

भारत परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) और व्यापक परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (CTBT) का, उसकी भेदभावपूर्ण नीति के कारण दृढ़ता से विरोध करता रहा है। भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम को शान्तिपूर्ण उद्देश्यों और न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने तक सीमित रखा है। भारत के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए अमेरिका ने भारत के साथ सन् 2008 ई० में परमाणु ऊर्जा से सम्बन्धित एक समझौता किया, जिसका समर्थन परमाणु आपूर्ति कर्ता समूह (NSG) के 45 देशों ने भी किया। भारत अपने परमाणु विकल्प को तब तक छोड़ने पर सहमत नहीं है, जब तक कि अन्य परमाणु शस्त्र सम्पन्न राष्ट्र इसके लिए तैयार नहीं हो जाते।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या यह वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता की नीति का उद्भव सन् 1961 ई० के बेलग्रेड सम्मेलन में हुआ था। इस सम्मेलन में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू, इण्डोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति गामेल अब्दुल नासिर तथा यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने सम्मिलित रूप से गुट-निरपेक्षता की नीति की घोषणा की थी और इस नीति में अपना पूर्ण विश्वास प्रकट किया था। यही इसके प्रवर्तक थे। इस नीति से आशय; विभिन्न देशों के गुटों से तटस्थ रहते (UPBoardMaster.com) हुए अपनी स्वतन्त्र नीति को अपनाना तथा समस्त देशों की अखण्डता में विश्वास प्रकट करना है। इस नीति के अन्तर्गत किसी भी प्रकार के शोषण, साम्राज्यवाद, रंग-भेद, युद्ध अथवा सैनिक गुटबन्दी का कोई स्थान नहीं है।

वर्तमान में गुट-निरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता

वर्तमान में शीत युद्ध की स्थिति नहीं है। इस समय विश्व में एक ही महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका है। इस बदली हुई स्थिति में कुछ लोग इस नीति की प्रासंगिकता पर सन्देह करते हैं, किन्तु ऐसी बात है नहीं। गुट-निरपेक्ष देशों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह इसके बढ़ते हुए महत्त्व का प्रतीक है। जर्मनी तथा नीदरलैण्ड तो इसके शिखर सम्मेलन में अतिथि देश के रूप में तथा चीन ने पर्यवेक्षक देश के रूप में भाग लिया। इन देशों का प्रयास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रहे। इस प्रकार गुट-निरपेक्षता की नीति वर्तमान में भी प्रासंगिक है।

प्रश्न 2.
रंगभेद से आप क्या समझते हैं?
या
रंग-भेद की नीति से कौन देश सबसे अधिक प्रभावित हुआ ? इसका तीव्र विरोध क्यों किया गया है? संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसके विरुद्ध जनपद निर्माण करने के लिए क्या कदम उठाये हैं ?
या
मानवाधिकार प्रत्येक मानव के लिए इतने अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं ? संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकार का सार्वभौम घोषणा-पत्र कब निर्गत किया था ?
उत्तर :
रंगभेद-नीति एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। अंग्रेज लोग अश्वेत लोगों के साथ अमानवीय एवं बर्बर व्यवहार करते थे। यह मानवता के विरुद्ध था। अफ्रीकी देशों में इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। अफ्रीका महाद्वीप की यह प्रमुख समस्या है-जातिवाद अथवा गोरे-काले की। इस समस्या का उदय यूरोपीय शक्तियों द्वारा किया गया। उनके शासनकाल में यहाँ श्वेत लोग आकर बसे तथा प्रशासन एवं उच्चस्तरीय कार्य इन्हीं के हाथों में था। ये शासक थे, अत: स्थानीय निवासियों पर मनमाना अत्याचार करते तथा उनको दास समझते थे। यह क्रम उस समय तक चलता रहा जब तक उनका शासन था यद्यपि अनेक बार इसका विरोध किया गया। किन्तु यूरोपीय अपनी जातीय उच्चता की भावना के कारण स्थानीय जनता का शोषण करते रहे। आज जबकि यहाँ के देश स्वतन्त्र हैं फिर भी (UPBoardMaster.com) जहाँ विदेशी हैं वहाँ यह समस्या वर्तमान है। इसके अतिरिक्त, यहाँ अनेक आदिवासी जातियाँ निवास करती हैं। उनका तथा शेष अफ्रीकियों में सामंजस्य करना इनके विकास के लिए अति आवश्यक है। यह समस्या द० रोडेशिया तथा द० अफ्रीका में उग्र रूप धारण कर चुकी है तथा वहाँ संघर्ष होता रहता है। अफ्रीकी राष्ट्रों ने एकजुट होकर संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच पर बार-बार यह मुद्दा उठाया और इनके साथ ‘मानव अधिकार’ का संदर्भ देकर इसे अन्तर्राष्ट्रीय अभिरुचि का विषय बना दिया। यही कारण था कि संयुक्त महासभा ने रंगभेद की नीति को 1973 में मानवता के प्रति अपराध’ घोषित किया तथा 1978 वर्ष को ‘रंगभेद विरोध वर्ष के रूप में मनाया गया।

प्रश्न 3.
विश्व-शान्ति के लिए निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है ? किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक युग में निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता आधुनिक आणविक युग में विश्व के राष्ट्रों के लिए नि:शस्त्रीकरण का मार्ग अपनाना श्रेयस्कर है, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर मानव की उपलब्धियों की रक्षा की जा सकती है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. विश्व-शान्ति की स्थापना के लिए- 
शस्त्रास्त्र नियन्त्रण में ही विश्व शान्ति निहित है। कोहन के
अनुसार, “नि:शस्त्रीकरण द्वारा राष्ट्रों के भय और मतभेद को कम करके शान्तिपूर्ण समझौतों की प्रक्रिया को सुविधापूर्ण तथा शक्तिशाली बनाया जा सकता है।” प्रो० शूमेन के अनुसार, “संघर्ष की आशंका ही शस्त्रीकरण की होड़ को जन्म देती है और युद्ध की सम्भावना से शस्त्रों में वृद्धि होती है। शस्त्रीकरण युद्ध मनोविज्ञान को जन्म देता है और उससे अविश्वास और भय की अभिव्यक्ति होती है। उससे समाज में एक ऐसे वर्ग का जन्म होता है जिसका युद्ध में निहित स्वार्थ होता है। (UPBoardMaster.com) शस्त्रास्त्र आरम्भ में व्यापक भुखमरी पैदा करते हैं और अन्त में उसकी परिणति व्यापक हत्याओं में होती है।
2. आर्थिक हानि से बचने के लिए- जिस धन का प्रयोग गन्दी बस्तियों को खत्म करने तथा सभी निर्धनों के लिए आवासगृहों को बनाने में व्यय किया जा सकता था उसको उस युद्ध के लिए हथियार बनाने में खर्च किया जाता है, जिसे न लड़ने की कसम अनेक बार खायी जा चुकी है। इससे विश्व में भुखमरी तथा गरीबी बढ़ती है, जो अन्ततोगत्वा विश्व-शान्ति के लिए खतरा पैदा करते हैं। जब तक विश्व में भुखमरी तथा गरीबी है तब तक विश्व शान्ति की स्थापना करना कठिन है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्तों को लिखिए।
उत्तर :
गुट-निरपेक्षता के तीन सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—

  • सैनिक गुटों से अलग रहना तथा महाशक्तियों के साथ समझौता न करना।
  • स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्धारण करना।
  • साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करना।

प्रश्न 2.
पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन थे ?
उत्तर :
पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक पं० जवारूलाल नेहरू थे।

प्रश्न 3.
पंचशील समझौता किस-किसके बीच हुआ ?
उत्तर :
पंचशील समझौता भारत तथा चीन के बीच हुआ था।

प्रश्न 4.
भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :

  • भारत किसी भी शक्ति-शिविर में सम्मिलित नहीं होना चाहता था।
  • भारत का पंचशील के सिद्धान्तों में पूरा विश्वास था।

प्रश्न 5.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित हुआ ?
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में सितम्बर, 1961 ई० में आयोजित हुआ था।

प्रश्न 6.
गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से क्या आशय है ?
या
गुट-निरपेक्षता की चौकड़ी से क्या आशय है ? 
या

गुट-निरपेक्षता की नीति का सूत्रपात करने वाले किन्हीं दो गैर-भारतीयों के नाम और उनके देशों का उल्लेख कीजिए।
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के जन्मदाताओं में से किन्हीं दो का नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित गुट-निरपेक्षता की नीति का इण्डोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर तथा यूगोस्लाविया के पूर्व राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने समर्थन किया था। इन्होंने ही निर्गुट (UPBoardMaster.com) आन्दोलन की नींव रखी थी। इन्हें ही गुट-निरपेक्षता की चौकड़ी समझना चाहिए। गुट-निरपेक्षता की त्रिमूर्ति से आशय जवाहरलाल नेहरू, मार्शल टीटो तथा अब्दुल नासिर से है।

प्रश्न 7.
भारत की विदेश-नीति के उद्देश्य बताइट।
उत्तर :
भारतीय विदेश नीति के निम्न उद्देश्य हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की व्यवस्था में सकारात्मक सहयोग प्रदान करना।
  • साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का वैधानिक विरोध करना।
  • सैनिक गुटबन्दियों से अपने आपको अलग रखना।
  • सभी राष्ट्रों के साथ शान्तिपूर्ण व सम्मानपूर्वक सम्बन्ध स्थापित करना।
  • सैनिक गुटबन्दियों व समझौतों से अपने आपको सर्वथा (UPBoardMaster.com) अलग रखना चाहिए।

बहुविकल्पीय

प्रश्न1. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अब तक आयोजित शिखर सम्मेलनों की संख्या है

(क) 17
(ख) 16
(ग) 14
(घ) 13

2. 1961 ई० में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम शिखर सम्मेलन कहाँ हुआ?
या
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सर्वप्रथम शिखर सम्मेलन किस नगर में हुआ था?

(क) बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में
(ख) दिल्ली (भारत) में
(ग) काहिरा (मिस्र) में
(घ) हवाना (क्यूबा) में

3. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सातवाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था-

(क) हरारे में
(ख) जकार्ता में
(ग) नयी दिल्ली में
(घ) बेलग्रेड में

4. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 14वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था-

(क) जकार्ता में
(ख) हरारे में
(ग) बेलग्रेड में
(घ) नयी दिल्ली में

5, पंचशील समझौता कब हुआ?

(क) 1950 ई० में
(ख) 1960 ई० में
(ग) 1945 ई० में
(घ) 1954 ई० में

6. पंचशील के सिद्धान्त में निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धान्त शामिल है?

(क) अनाक्रमण
(ख) समानता एवं पारस्परिक लाभ
(ग) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व
(घ) ये सभी

7. भारत की विदेश-नीति निम्नलिखित में से किसका समर्थन नहीं करती है?

(क) नि:शस्त्रीकरण ।
(ख) उपनिवेशवाद
(ग) गुट-निरपेक्षता
(घ) पंचशील

8. निम्नलिखित में से कौन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बन्धित नहीं है?

(क) मिस्र के नासिर
(ख) इण्डोनेशिया के सुकणों
(ग) भारत के जवाहरलाल नेहरू
(घ) चीन के चाऊ-एन-लाई

9. वर्ष 2012 में गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन किस देश में आयोजित हुआ था ?

(क) भारत
(ख) पाकिस्तान
(ग) ईरान
(घ) बांग्लादेश

10. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तत्त्व भारतीय विदेश-नीति का आधार नहीं है ?

(क) विश्व शान्ति की स्थापना में सहयोग
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का पालन
(ग) उपनिवेशवाद का समर्थन
(घ) सैनिक गुटबन्दियों से पृथकता

11. निःशस्त्रीकरण आवश्यक है

(क) विश्व शान्ति के लिए
(ख) युद्ध रोकने के लिए
(ग) मानव संहार रोकने के लिए।
(घ) ये सभी

12. निम्नलिखित में से गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का अग्रदूत कौन था ?

(क) मार्शल टीटो
(ख) जोसेफ स्टालिन
(ग) विंस्टन चर्चिल
(घ) फ्रेंकलिन रुजवेल्ट

13. निम्नलिखित में से पंचशील सिद्धान्त के प्रतिपादक कौन थे ?

(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) सुभाषचन्द्र बोस
(घ) बी०आर० अम्बेडकर

14. ‘सह-अस्तित्व’ का सिद्धान्त निरूपित किया गया था

(क) संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में
(ख) पंचशील की घोषणा में
(ग) मानवाधिकारों की घोषणा में
(घ) भारतीय संविधान की उद्देशिका में

15. ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ पुस्तक का लेखक कौन है?

(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) मौलाना अब्दुल कलाम आजाद
(ग) सुभाष चन्द्र बोस
(घ) महात्मा गाँधी

उत्तरमाला

1. (क), 2. (क), 3. (ग), 4. (ख), 5. (घ), 6. (घ), 7. (ख), 8. (घ), 9. (ग), 10. (ग), 11. (घ), 12. (क), 13. (क), 14. (ख), 15. (क)

UP Board Master for Class 10 Social Science chapter List

Leave a Comment